कड़कनाथ कुक्कुट पालन योजना और आजीविका मिशन के संयुक्त प्रयास ग्रामीण अंचलों में महिलाओं को आर्थिक रूप से सुदृढ़ कर आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार कर रहे हैं। मंडला जिले के विकासखंड बीजाडांडी अंतर्गत ग्राम बम्होरी की रहने वाली श्रीमती कपूरिया वरकड़े का जीवन कुछ समय पहले तक बेहद संघर्षपूर्ण था। आजीविका मिशन के स्व-सहायता समूह से जुड़ने से पूर्व उनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी। आय का कोई स्थाई साधन न होने के कारण उनके परिवार को अपनी बुनियादी आवश्यकताओं और जीविकोपार्जन के लिए गंभीर आर्थिक तंगहाली और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता था।
बदलाव की शुरुआत: आजीविका मिशन का साथ
जीवन की इन कठिन परिस्थितियों के बीच, श्रीमती कपूरिया दीदी ने ज्योति आजीविका स्व-सहायता समूह की सदस्यता ग्रहण की। समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने अपनी पारिवारिक स्थिति के बारे में समूह और शांति महिला आजीविका ग्राम संगठन की बैठक में चर्चा की। उनकी लगन, ईमानदारी और सक्रियता को देखते हुए आजीविका मिशन द्वारा उन्हें ग्राम संगठन के माध्यम से कृषि उद्यमिता (कृषि उद्यमी मित्र) के रूप में चयनित किया गया। चयन के उपरांत, मिशन द्वारा उन्हें 35 दिनों का सघन एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया, जिसने उनके भीतर एक सफल उद्यमी बनने का आत्मविश्वास जगाया।
खास बातें
- चयन के उपरांत, मिशन द्वारा उन्हें 35 दिनों का सघन एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया गया, जिसने उनके भीतर एक सफल उद्यमी बनने का आत्मविश्वास जगाया।
- प्रथम बार 50 हजार रूपए का ऋण, द्वितीय बार 90 हजार रूपए का ऋण, इस पूंजी से उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर उन्नत स्तर का कड़कनाथ मुर्गी पालन कार्य प्रारंभ किया।
- कपूरिया दीदी कहती है कि वर्तमान मासिक आय 45 हजार रूपए से 48 हजार रूपए है।
कड़कनाथ कुक्कुट पालन और वैज्ञानिक पद्धति
प्रशिक्षण से प्राप्त तकनीकी ज्ञान का लाभ उठाते हुए, कपूरिया दीदी ने आत्मनिर्भर बनने का दृढ़ संकल्प लिया। उन्होंने व्यवसाय शुरू करने के लिए समूह के माध्यम से दो चरणों में ऋण प्राप्त किया। प्रथम बार 50 हजार रूपए का ऋण, द्वितीय बार 90 हजार रूपए का ऋण, इस पूंजी से उन्होंने वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर उन्नत स्तर का कड़कनाथ मुर्गी पालन कार्य प्रारंभ किया। शासन के मार्गदर्शन और समूह के वित्तीय व तकनीकी सहयोग से उनका यह व्यवसाय तेजी से फलने-फूलने लगा।
खुद बनीं आत्मनिर्भर, दूसरों को भी दिखाई राह
कपूरिया दीदी न केवल स्वयं आत्मनिर्भर बनीं, बल्कि उन्होंने समाज के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई। कृषि उद्यमी के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने अपने ग्राम संगठन की अन्य समूह दीदियों को उन्नत कृषि और पशुपालन पद्धतियों पर प्रशिक्षण दिया। उनकी इस पहल से प्रेरित होकर गाँव की 8 से 10 अन्य दीदियों ने भी मुर्गी पालन का कार्य शुरू किया। जिससे उन परिवारों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।
कपूरिया दीदी कहती है कि वर्तमान मासिक आय 45 हजार रूपए से 48 हजार रूपए है। मध्यप्रदेश शासन की मंशानुसार मेरा चयन लखपति दीदी के रूप में हुआ। आज आर्थिक रूप से स्वावलंबी होने के बाद कपूरिया दीदी और उनका पूरा परिवार एक खुशहाल, समृद्ध और सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर रहा है। उनकी यह कहानी ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण और स्वरोजगार की एक अनुपम मिसाल है।




