परंपरागत रूप से धान उत्पादन के लिए पहचाने जाने वाले बालाघाट जिले में अब किसान नकदी फसलों की ओर भी कदम बढ़ा रहे हैं। इन्हीं में जिमिकंद (सूरन) की खेती किसानों के लिए बेहतर आय का नया विकल्प बनकर सामने आ रही है। खैरलांजी विकासखंड के ग्राम पुलपुट्टा के हरिटोला निवासी प्रगतिशील किसान हर्षद सोनवाने ने एक एकड़ भूमि पर प्राकृतिक तरीके से जिमिकंद की खेती कर क्षेत्र के किसानों के लिए नई मिसाल पेश की है।
बालाघाट जिले में अब तक जिमिकंद की खेती बड़े पैमाने पर नहीं होती थी। अधिकांश ग्रामीण अपने घरों की बाड़ी में इसके कंद लगाकर घरेलू उपयोग के लिए सूरन तैयार करते थे। वहीं किरनापुर और लांजी क्षेत्र के कुछ किसान धान के खेतों की मेड़ों पर इसकी खेती कर अतिरिक्त आय अर्जित करते रहे हैं। लेकिन अब बढ़ती मांग और बेहतर मुनाफे को देखते हुए किसान इसकी व्यावसायिक खेती की ओर भी आकर्षित हो रहे हैं।
इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए किसान हर्षद सोनवाने ने एक एकड़ खेत में पूरी तरह प्राकृतिक पद्धति से जिमिकंद का उत्पादन किया है। इस खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता, जिससे उत्पादन पूरी तरह प्राकृतिक एवं स्वास्थ्यवर्धक होता है। कम लागत और बेहतर उत्पादन के कारण यह खेती किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही है।
जिमिकंद, जिसे सूरन भी कहा जाता है, पोषक तत्वों और खनिजों से भरपूर होता है। इसकी सब्जी स्वाद और पौष्टिकता के कारण काफी पसंद की जाती है तथा इसे कई स्थानों पर "देशी पनीर" के नाम से भी जाना जाता है। बाजार में इसकी कीमत सामान्यतः 40 से 50 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल जाती है, जिससे किसानों को धान की तुलना में कहीं अधिक आर्थिक लाभ प्राप्त होता है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक एवं प्राकृतिक पद्धति से जिमिकंद की खेती अपनाएं तो कम लागत में अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं। बदलते कृषि परिदृश्य में यह फसल धान के साथ-साथ आय का मजबूत विकल्प बन सकती है।
ग्राम पुलपुट्टा के किसान हर्षद सोनवाने की यह पहल दर्शाती है कि यदि किसान नई फसलों को अपनाने का साहस करें तो खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है। उनकी सफलता अब आसपास के किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है और उम्मीद है कि आने वाले समय में बालाघाट जिले में भी जिमिकंद की खेती का रकबा बढ़ेगा।







